
“कोरबा (छत्तीसगढ़)। भारत की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले कोरबा जिले में कोयला उत्पादन से जुड़ी SECL (South Eastern Coalfields Limited) की बड़ी परियोजनाओं में स्थानीय बेरोजगार युवाओं और भू-विस्थापितों की उपेक्षा का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के जिला अध्यक्ष (ग्रामीण) मनमोहन राठौर ने जिला प्रशासन और SECL प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सख्त चेतावनी दी है – “रोजगार नहीं तो आंदोलन”।
राठौर ने जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि जिले के दीपका, गेवरा, कुसमुंडा, पाली और कोरबा क्षेत्रों में कोयला खदानों से भारी उत्पादन हो रहा है, लेकिन स्थानीय प्रभावित परिवारों, भू-विस्थापितों और जिले के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता नहीं दी जा रही। ठेका कंपनियां बाहर के राज्यों और शहरों के लोगों को काम पर रख रही हैं, जबकि नीति के अनुसार सबसे पहले स्थानीय लोगों का हक बनता है।
मुख्य आरोप
स्थानीय युवाओं के साथ अन्याय: खदानों और परियोजनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित होने के बावजूद स्थानीय युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। इससे क्षेत्र में आक्रोश बढ़ रहा है।
प्रशासन की उदासीनता: 16 मार्च को दिए गए आवेदन के सात दिन बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। NSUI ने इसे “टालमटोल और निष्क्रियता” करार दिया है।
ठेका कंपनियों पर आरोप: बाहरी लोगों को प्राथमिकता देने का मामला।
आंदोलन का प्लान
अगर 10 अप्रैल तक समस्या का समाधान नहीं हुआ तो NSUI 60 किमी लंबी “रोजगार दो न्याय यात्रा” निकालेगा। यह यात्रा ग्राम पंचायत बोईदा (पाली) से शुरू होकर दो दिन में पूरी होगी और तीसरे दिन से कलेक्टर कार्यालय का अनिश्चितकालीन घेराव किया जाएगा।
राजनीतिक समर्थन के संकेत
मनमोहन राठौर ने इस मुद्दे की जानकारी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, सांसद ज्योत्सना महंत, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल, NSUI प्रदेश अध्यक्ष और जिला कांग्रेस कमेटी समेत कई बड़े नेताओं को भेज दी है। इससे आंदोलन के व्यापक राजनीतिक रूप लेने की संभावना बढ़ गई है।
कोरबा का संदर्भ
कोरबा जिला देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली अहम कोयला खदानों का केंद्र है। यहां SECL की परियोजनाएं चल रही हैं, लेकिन लंबे समय से भू-विस्थापितों को रोजगार, मुआवजा और पुनर्वास को लेकर शिकायतें आती रही हैं। NSUI का यह आंदोलन अगर जनसमर्थन जुटाता है तो राज्य स्तर पर बड़ा मुद्दा बन सकता है।
अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और SECL प्रबंधन पर टिकी हैं – क्या वे संवाद के जरिए असंतोष को शांत करेंगे या आंदोलन की आंच और बढ़ने देंगे ?








