
कोरबा, 11 फरवरी 2026: छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले सहित आसपास के शहरों में गुटखा की खुलेआम कालाबाजारी ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से कहीं अधिक दामों पर गुटखा बेचे जाने की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। सस्ते दामों में बिकने वाली ‘राजश्री’ गुटखा की पुड़िया, जो मूल रूप से 5 रुपये में उपलब्ध होती थी, अब बाजार में 7 रुपये तक बिक रही है। उपभोक्ताओं में आक्रोश व्याप्त है, जबकि थोक विक्रेताओं पर कृत्रिम कमी पैदा कर मुनाफा कमाने का आरोप लग रहा है।
पैकेट पर एक कीमत, बाजार में दूसरी वसूली
जानकारी के मुताबिक, राजश्री गुटखा के बड़े पैकेट पर स्पष्ट रूप से 120 रुपये का रिटेल प्राइस अंकित है। लेकिन स्थानीय बाजारों में खुदरा विक्रेताओं को थोक स्तर पर ही इससे अधिक दामों पर माल सप्लाई किया जा रहा है। नतीजा? ग्राहकों से एमआरपी से 20-30 प्रतिशत ज्यादा वसूली हो रही है। एक स्थानीय उपभोक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “पैकेट पर साफ लिखा है 5 रुपये, लेकिन दुकानदार 7 रुपये मांगते हैं। यह सीधा धोखा है। जब हम शिकायत करते हैं, तो वे कहते हैं ‘माल महंगा पड़ रहा है’।”
यह समस्या केवल राजश्री तक सीमित नहीं है। कोरबा के बाजारों में अन्य ब्रांडों के गुटखा पर भी इसी तरह की मनमानी देखने को मिल रही है। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों का खुला उल्लंघन भी।
थोक कारोबारियों का काला खेल: कमी पैदा कर ऊंचे दाम
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, कुछ थोक विक्रेता और डिस्ट्रीब्यूटर जानबूझकर सप्लाई रोककर बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर रहे हैं। पहले स्टॉक कम किया जाता है, फिर बढ़ी हुई मांग का फायदा उठाकर ऊंचे दामों पर माल बेचा जाता है। छोटे दुकानदारों ने गुमनामी की शर्त पर खुलासा किया कि उन्हें पहले की तुलना में 15-20 प्रतिशत महंगा स्टॉक मिल रहा है।
एक दुकानदार ने फोन पर बातचीत में कहा, “हमें ही महंगा माल मिल रहा है। अगर हम एमआरपी पर बेचें तो घाटा होगा। मजबूरी में ग्राहकों से 2 रुपये अतिरिक्त लेना पड़ रहा है। लेकिन हमारी मजबूरी का फायदा थोक वाले उठा रहे हैं।” यह स्थिति न केवल खुदरा व्यापारियों को परेशान कर रही है, बल्कि पूरी सप्लाई चेन पर सवाल खड़े कर रही है।
कानूनी उल्लंघन: दंडनीय अपराध, जांच जरूरी
कानूनन, किसी भी पैक्ड उत्पाद को एमआरपी से अधिक दाम पर बेचना गैरकानूनी है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 18 के तहत यह दंडनीय अपराध माना जाता है, जिसमें जुर्माना या कारावास तक की सजा हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर थोक स्तर पर ही ओवरप्राइसिंग हो रही है, तो जांच सप्लाई चेन की जड़ तक पहुंचनी चाहिए। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के नियमों के अनुसार, थोक गोदामों पर सख्त निगरानी जरूरी है।
प्रशासन की चुप्पी: छापेमारी की मांग तेज
हालांकि शिकायतें दर्ज हो रही हैं, लेकिन खाद्य एवं औषधि विभाग या जिला प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। शहरवासी अब थोक गोदामों में छापेमारी और स्टॉक जांच की मांग कर रहे हैं। सामाजिक संगठन ‘उपभोक्ता जागृति मंच’ के संयोजक ने कहा, “यह कालाबाजारी स्वास्थ्य हानिकारक उत्पाद को और महंगा बना रही है। प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, वरना हम आंदोलन करेंगे।”
जिला कलेक्टर कार्यालय से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि आंतरिक जांच शुरू हो चुकी है।
आम आदमी पर बोझ: महंगाई में अतिरिक्त चोट
गुटखा स्वास्थ्य के लिए घातक होने के बावजूद कोरबा जैसे औद्योगिक शहरों में लाखों लोग इसका सेवन करते हैं। महंगाई के इस दौर में 2 रुपये की बढ़ोतरी छोटी लग सकती है, लेकिन दैनिक उपभोक्ताओं के लिए यह जेब काटने जैसी है। विशेषज्ञ चेताते हैं कि ऐसी कालाबाजारी न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि अवैध व्यापार को बढ़ावा भी देती है।
उपभोक्ताओं से अपील है कि ऐसी शिकायतें जिला उपभोक्ता फोरम या हेल्पलाइन 14404 पर दर्ज कराएं। प्रशासन अगर फौरन कदम नहीं उठाया, तो यह मामला और विकराल रूप धारण कर सकता है। क्या कोरबा के बाजारों में अब सख्ती दिखेगी? शहरवासी इंतजार में हैं।
(रिपोर्ट: स्थानीय संवाददाता। यदि आपके पास ऐसी कोई शिकायत है, तो संपर्क करें।)








