
पटना। मधेपुरा जिले में एक 15 वर्षीय नाबालिग छात्र को दो महीने से अधिक समय तक वयस्क जेल में रखने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने बिहार पुलिस और राज्य सरकार पर तीखी फटकार लगाई है। कोर्ट ने इस गिरफ्तारी को पूरी तरह असंवैधानिक और अवैध करार देते हुए राज्य सरकार को पीड़ित छात्र को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। साथ ही, 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में परिवार को देने का भी आदेश दिया गया है।
यह फैसला न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति ऋतेश कुमार की खंडपीठ ने 9 जनवरी 2026 को सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संवैधानिक अदालत ऐसे गंभीर उल्लंघनों पर ‘मूक दर्शक’ नहीं रह सकती। छात्र के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन हुआ है।
क्या है पूरा मामला?
- मामला मधेपुरा जिले के पुरैनी थाना अंतर्गत एक गांव में जमीन विवाद से जुड़ी मारपीट और चोरी के आरोप से संबंधित है। 11 जुलाई 2025 को दर्ज FIR में छात्र सहित 10 लोगों के नाम थे।
- छात्र को 23 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया। जांच अधिकारी ने उसकी उम्र गलत तरीके से 19 वर्ष बताकर वयस्क के रूप में पेश किया और सीधे जेल भेज दिया।
- FIR में नाम होने के बावजूद चार्जशीट में छात्र का नाम नहीं था, और कोई ठोस सबूत नहीं था।
- बाद में मजिस्ट्रेट ने उम्र जांच के लिए किशोर न्याय बोर्ड को भेजा, जहां रिपोर्ट में छात्र की उम्र 15 वर्ष 6 महीने 8 दिन पाई गई।
- छात्र को दो महीने से अधिक (लगभग ढाई महीने) जेल में रखा गया, जिससे उसे शारीरिक और मानसिक यातना झेलनी पड़ी।
कोर्ट के मुख्य निर्देश:
- 5 लाख रुपये मुआवजा राज्य सरकार द्वारा एक महीने के भीतर छात्र को दिया जाए।
- यह राशि बाद में दोषी पुलिस अधिकारियों और संबंधित अधिकारियों से वसूली जाए।
- 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में परिवार को दिए जाएं।
- बिहार पुलिस महानिदेशक को मामले की प्रशासनिक जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करने का आदेश।
- छात्र को तुरंत किशोर न्याय बोर्ड द्वारा ऑब्जर्वेशन होम/चिल्ड्रन होम से रिहा किया जाए।
फैसले की प्रति मधेपुरा के प्रधान जिला न्यायाधीश, किशोर न्याय बोर्ड और पुलिस महानिदेशक को भेजी जाए।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस और मजिस्ट्रेट की लापरवाही से नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। ऐसे मामलों में उचित मुआवजा देकर न्याय सुनिश्चित करना जरूरी है।
यह फैसला बिहार पुलिस की जांच प्रक्रिया और किशोर न्याय प्रणाली में गंभीर खामियों को उजागर करता है। परिवार और सामाजिक संगठनों ने कोर्ट के इस सख्त रुख की सराहना की है, और उम्मीद जताई है कि इससे भविष्य में ऐसे अन्यायपूर्ण गिरफ्तारियों पर लगाम लगेगी।









