
कोरबा (छत्तीसगढ़), 9 मार्च 2026: छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के पोड़ी-उपरोड़ा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत अमझर (अ) में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम 2005 के उल्लंघन का गंभीर मामला सामने आया है। एक जागरूक नागरिक आवेदक ने पंचायत से वित्तीय वर्ष 2024-25 में मुरुम (मुर्रम) कार्य के भुगतान से संबंधित बिल-बाउचर की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं, लेकिन लोक सूचना अधिकारी (पंचायत सचिव) द्वारा निर्धारित समयसीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। इससे नाराज आवेदक अब मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ, जनपद पंचायत) के समक्ष न्याय की मांग कर रहे हैं और यदि स्थानीय स्तर पर समाधान नहीं हुआ तो राज्य सूचना आयोग तक मामला पहुंचाने की तैयारी में हैं।
- मामले की पूरी समयरेखा इस प्रकार है:
- 16 सितंबर 2025: आवेदक ने ग्राम पंचायत अमझर (अ) के लोक सूचना अधिकारी से आरटीआई आवेदन दाखिल कर वित्तीय वर्ष 2024-25 में मुरुम कार्य हेतु किए गए भुगतान के बिल-बाउचर की प्रमाणित प्रतियां मांगीं।
- आरटीआई नियमों के अनुसार, सामान्य मामलों में 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध करानी अनिवार्य है।
- लेकिन पंचायत सचिव ने तय समयसीमा में सही, स्पष्ट एवं संतोषजनक जानकारी देने के बजाय भ्रमित करने वाली प्रतिक्रिया दी।
- 10 अक्टूबर 2025: आवेदक ने जनपद पंचायत कार्यालय में जनसूचना अधिकारी (सीईओ) के समक्ष प्रथम अपील दाखिल की।
- अपील के बाद जनसूचना अधिकारी ने लोक सूचना अधिकारी को 15 दिनों के भीतर पूरी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
- निर्देशों की अवहेलना करते हुए पंचायत सचिव ने जानकारी प्रदान नहीं की।
- 27 फरवरी 2026: आवेदक ने मुख्य कार्यपालन अधिकारी को शिकायती आवेदन सौंपा, जिसमें आरटीआई उल्लंघन, अपीलीय आदेश की अवहेलना और विधिक दायित्वों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए सख्त कार्रवाई तथा तत्काल जानकारी प्रदान करने की मांग की गई।
आवेदक ने कहा, “आरटीआई अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का मजबूत माध्यम है। पंचायत सचिव ने न केवल कानून तोड़ा, बल्कि आम नागरिक के मौलिक अधिकारों का भी अपमान किया। यदि यहां न्याय नहीं मिला, तो मैं राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील (धारा 19) दाखिल करूंगा और धारा 20 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की मांग करूंगा।”
आरटीआई विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि लोक सूचना अधिकारी समय पर जानकारी नहीं देते या अपील का पालन नहीं करते, तो आवेदक को निशुल्क जानकारी मिलने का प्रावधान है (धारा 7(6))। साथ ही, उल्लंघन पर जुर्माना और विभागीय कार्रवाई भी संभव है।
यह मामला ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही, पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही के अभाव को उजागर करता है। जिला प्रशासन और जनपद पंचायत पोड़ी-उपरोड़ा से अब उम्मीद की जा रही है कि शिकायत पर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी ताकि आरटीआई अधिनियम की गरिमा बरकरार रहे। आवेदक जैसे जागरूक नागरिकों की यह लड़ाई लोकतंत्र में सूचना के अधिकार को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
स्थानीय निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता इस घटना पर नजर बनाए हुए हैं। क्या मुख्य कार्यपालन अधिकारी इस मामले में सख्त रुख अपनाते हैं या फिर लापरवाही जारी रहती है? समय ही बताएगा।
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