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जवाली में आस्था और परंपरा का संगम, श्रद्धा से मनाया गया कमरछठ पर्व

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Written by
डी.के. सरजाल

 

 

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छत्तीसगढ़ी संस्कृति एवं परंपरा के अनुरूप हुआ आयोजन, खराब मौसम भी नहीं डिगा माताओं का उत्साह

जवाली। संतान की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की मंगलकामना को लेकर माताओं द्वारा मनाया जाने वाला पारंपरिक हलषष्ठी (कमरछठ) पर्व ग्राम जवाली में श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। वर्षा एवं खराब मौसम के बावजूद माताओं एवं श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ और बड़ी संख्या में महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना में सहभागिता निभाई।

 

पर्व के अवसर पर प्रातः 10 बजे के बाद समूहवार पूजा-अर्चना का शुभारंभ किया गया। माताओं ने विधि-विधान के साथ पूजा संपन्न की। कमरछठ की परंपरा के अनुसार पूजा में भैंस के दूध, बिना हल चले खेतों से प्राप्त सामग्री, छह प्रकार की भाजी, महुआ, लाई, राहड़ दाना तथा पसहर चावल से तैयार खीर सहित पारंपरिक प्रसाद का उपयोग किया गया। भाजी में सेंधा नमक का प्रयोग किया गया।

 

पूजा के दौरान माताओं ने अपने परिवार एवं संतान की सुख-शांति, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। पारंपरिक मान्यता के अनुसार पीठ पर सात-सात बार ठप्पा लगाने की रस्म भी श्रद्धापूर्वक निभाई गई।

 

इसी क्रम में गौतम, गुड्डू एवं रामसनेही महाराज के निवास पर उनकी माताजी के मार्गदर्शन में कमरछठ की कथा एवं सामूहिक आरती का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में माताओं एवं श्रद्धालुओं ने एकजुट होकर कमरछठ की कथा का श्रवण किया तथा सामूहिक आरती में शामिल होकर धार्मिक एवं सांस्कृतिक भावना को आत्मसात किया।

 

लोकपरंपरा और संस्कृति को जीवंत रखने वाला पर्व

 

कमरछठ पर्व केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को जीवंत रखने वाला महत्वपूर्ण पर्व भी है। बदलते समय के बावजूद ग्रामीण अंचलों में इस तरह के पारंपरिक आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपराओं और जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

 

बारिश और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां भी माताओं की श्रद्धा और उत्साह के सामने बाधा नहीं बन सकीं। सामूहिक रूप से पर्व मनाते हुए ग्रामवासियों ने “परंपरा कायम रहे और संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहे” का संदेश दिया।

 

आयोजन के दौरान तीजबाई, बबली, सरस्वती, उमा, रजनी, दिलबाई, शीला, सिकन, दरहीन, आयो सहित बड़ी संख्या में महिलाओं की सहभागिता रही। पूरे आयोजन के दौरान आपसी सामाजिक एकता, भाईचारे और श्रद्धा का सुंदर वातावरण देखने को मिला।

 

 

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